पटना न्यूज डेस्क: 2025 के चुनाव खत्म होते ही बिहार में अब सरकारी बंगले खाली कराने को लेकर नई जंग शुरू हो गई है। सत्ता पक्ष इसे नियम-कानून का पालन बता रहा है, जबकि विपक्ष इसे बदले की कार्रवाई मान रहा है। मामला तब गरमा गया जब भवन निर्माण विभाग ने पूर्व मुख्यमंत्री और मौजूदा नेता प्रतिपक्ष राबड़ी देवी को 10 सर्कुलर रोड खाली करने का नोटिस भेज दिया। इसी के बीच फिर ये सवाल उठने लगे कि कभी तेजस्वी यादव से 5, देशरत्न मार्ग वाला बंगला कैसे खाली कराया गया था, जो कई सालों तक निचली अदालत से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक चर्चा में रहा।
कहानी की शुरुआत 2015 से होती है, जब नीतीश कुमार ने एनडीए छोड़कर राजद के साथ सरकार बनाई और तेजस्वी यादव उपमुख्यमंत्री बने। उन्हें 5, देशरत्न मार्ग वाला सरकारी बंगला मिला, जिसे उन्होंने अपनी पसंद के हिसाब से तैयार किया। दो साल रहते-रहते वह इस घर से भावनात्मक रूप से जुड़ गए। लेकिन 2017 में जब नीतीश फिर एनडीए में लौट आए, तो तेजस्वी अपनी कुर्सी भी खो बैठे और बंगला खाली करने का आदेश भी आ गया। तेजस्वी ने इस आदेश को मानने से इनकार किया और मामला हाई कोर्ट पहुंच गया।
हाई कोर्ट ने भी राहत नहीं दी तो तेजस्वी सुप्रीम कोर्ट चले गए, लेकिन वहां भी फैसला उनके खिलाफ गया। सुप्रीम कोर्ट ने साफ आदेश दिया कि बंगला तुरंत खाली किया जाए और चाबी भवन निर्माण विभाग को सौंप दी जाए। साथ ही सरकारी आवास पर कब्जा बनाए रखने के लिए 50 हजार रुपये का जुर्माना भी लगा। इसके बाद तेजस्वी को बंगला छोड़ना पड़ा। इसी बंगले के ‘अपशगुन’ की कहानी आगे बढ़ती रही—बाद में यही बंगला सुशील मोदी, तार किशोर प्रसाद और फिर सम्राट चौधरी को मिला, जिनके राजनीतिक सफर पर भी इसका असर दिखाई दिया।
बाद में जब सम्राट चौधरी उपमुख्यमंत्री बने, तो उन्हें भी नियम के अनुसार यही बंगला मिला। लेकिन वे लंबे समय तक इसमें नहीं शिफ्ट हुए। आखिरकार 2024 की विजयादशमी पर पूजा-पाठ के बाद गृहप्रवेश किया, पर उससे पहले उन्होंने बंगले के दक्षिण दिशा वाले गेट को वास्तु के मुताबिक बंद करवा दिया। दिलचस्प बात यह रही कि इसके बाद सम्राट चौधरी का राजनीतिक ग्राफ ऊपर गया और नई सरकार बनने पर वे दोबारा डिप्टी सीएम बन गए। इसी वजह से अब 5, देशरत्न मार्ग को ‘अपशगुनी’ से ‘लकी’ होने तक की पूरी कहानी फिर चर्चा में है।